


गाजीपुर। अतिप्राचीन रामलीला कमेटी के तत्वावधान में लीला के दूसरे दिन वन्देवाणी विनायको आदर्श रामलीला मण्डल द्वारा पूरी भव्यता के साथ हरिशंकरी श्रीराम चबुतरा पर 22 सितम्बर गुरूवार को शाम 8 बजे लीला के दौरान मुनि आगमन अहिल्या उद्वार तथा ताड़का वध लीला का मंचन किया गया।
बताया गया कि गुरू वशिष्ठ के आश्रम से शिक्षा ग्रहण करने के बाद श्रीराम अपने भाईयों के साथ वापस अयोध्या आते हैं। दूसरे दिन महाराज दशरथ कुल गुरू वशिष्ठ के सानिध्य में श्रीराम को अयोध्या का राजपाट देने की सलाह मंत्री सुमंत्र तथा पुरवासियों से विचार विमर्श कर रहे थे कि इसी बीच ब्रह्मर्षि विश्वामित्र राजदरबार के गेट पर आ जाते हैं, उनके आने की सूचना द्वारपालों द्वारा महाराज दशरथ को दिया गया। सूचना पाकर विश्वामित्र के स्वागतार्थ महाराज दशरथ तथा महर्षि वशिष्ठ राजदरबार के गेट पर आकर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र को आदरपूर्वक राजदरबार में ले गये तथा उनका महाराज दशरथ पाद प्रक्षालन किया। उसके बाद उन्होंने कहा कि के हि कारन आगमन तुम्हारा इतना सुनने के बाद विश्वामित्र ने कहा कि हे राजन असुर समूह सतावहिं मोहि मैं आयहु नृप जाचन तोहि। कहा कि हे राजन हमारे आश्रम पर यज्ञ हवन में असुरों द्वारा बाधा पहुँचाया जा रहा है। हवनकुण्ड में हड्डी, मांस का लोथा असुरों द्वारा फेका जा रहा है, जिससे कि यज्ञ हवन का कार्य पूरा न हो सके। अतः मुझे यज्ञ की रक्षा के लिए अपने दोनों बालक हो सके। अतः मुझे यज्ञ की रक्षा के लिए अपने दोनों बालक राम, लक्ष्मण को मेरे साथ भेजने का कष्ट करंे।



महाराज दशरथ ने अपने कुल गुरूमहर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार अपने दोनों पुत्रों को विश्वामित्र के साथ यज्ञ की रक्षा के लिए भेज देते हैं। रास्ते में राम, लक्ष्मण द्वारा शिला को देखा गया। उन्होंने शिला के बारे मंे जानकारी प्राप्त किया। विश्वामित्र ने कहा कि हे राम यह शिला गौतम ऋषि अपनी पत्नी को श्राप देकर पत्थर बना दिया हैं। अतः वर्षो से यह शिला आपके चरण रज को चाहती हैं। विश्वामित्र के इतना कहते ही राम ने पत्थर को अपने चरण से स्पर्श कर लिया। इस तरह वह पत्थर अहिल्या का रूप धारण कर लिया। लीला में दर्शाया गया कि गुरूविश्वामित्र के साथ राम, लक्ष्मण आगे चलते हैं तो घोर जंगल में उन्हे विशाल पद चिन्ह दिखा। श्रीराम ने विश्वामित्र से पूंछा कि हे मुनि यह पद चिन्ह किसका है। विश्वामित्र ने राम के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि हे राम यह पद चिन्ह राक्षसी ताड़का का है। वह इसी ताड़का वन में कही विश्राम करती होगी। इतना सुनते ही श्रीराम ने अपने धनुष के टंकार किया। टंकार की ध्वनि सुनते ही राक्षसी ताड़का उठकर विश्वामित्र पर ज्योंहि झपटी तो तत्काल श्रीराम, लक्ष्मण ने अपनी बाणों से राक्षसी ताड़का का वध कर डाला। इस प्रकार लीला के माध्यम से ताड़का वध प्रसंग का मंचन किया गया। इसके बाद महर्षि विश्वामत्रि के साथ राम, लक्ष्मण उनके आश्रम में पहुँचकर यज्ञ की रक्षा करते हुए अपने धनुष बाण से सुबाहू मारिज का भी वध कर दिया। इस लीला को देखकर श्रद्धालु दर्शक जय श्रीराम घोष से लीला स्थल को गुंजायमान कर दिया। इस अवसर पर अतिप्राचीन रामलीला कमेटी के अध्यक्ष प्रकाशचन्द श्रीवास्तव “एडवोकेट”, उपाध्यक्ष विनय कुमार सिंह, मंत्री ओमप्रकाश तिवारी, संयुक्त मंत्री लक्ष्मीनरायन, उप मंत्री पं0 लवकुमार त्रिवेदी, प्रबंधक बीरेश राम वर्मा (ब्रह्मचारी जी), उप प्रबंधक मयंक कुमार तिवारी उर्फ सिक्की, सरदार चरनजीत सिंह, योगेश कुमार वर्मा “एडवोकेट“, वरूण कुमार अग्रवाल, पं0 कृष्णबिहारी त्रिवेदी (पत्रकार), रामसिंह यादव, राजकुमार शर्मा आदि उपस्थित रहे।





