उच्च शिक्षा के शिक्षकों में रोष: कैशलेस चिकित्सा सुविधा से वंचित रखे जाने पर राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने उच्च शिक्षा मंत्री को पत्र लिखा
लखनऊ/गाजीपुर। उत्तर प्रदेश में बेसिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग के लाखों शिक्षकों एवं कर्मचारियों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा प्रदान करने के कैबिनेट फैसले के बावजूद उच्च शिक्षा विभाग (महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय) के शिक्षकों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों, स्ववित्तपोषित शिक्षकों तथा अवकाश प्राप्त कर्मियों को इस लाभ से बाहर रखे जाने पर शिक्षक संगठनों में गहरा असंतोष फैल गया है।जिसको लेकर राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, उत्तर प्रदेश के प्रदेश प्रभारी प्रोफेसर (डॉ.) राघवेन्द्र कुमार पाण्डेय ने गुरुवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय को पत्र लिखकर इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान आकर्षित किया है। पत्र में उन्होंने याद दिलाया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षक दिवस 5 सितंबर 2025 को उच्च शिक्षा के शिक्षकों एवं कर्मचारियों सहित स्ववित्तपोषित शिक्षकों को कैशलेस चिकित्सा सुविधा देने की घोषणा की थी। हालांकि, 29 जनवरी 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग के करीब 15 लाख शिक्षकों, शिक्षामित्रों, अनुदेशकों और कर्मचारियों को यह सुविधा प्रदान करने का निर्णय लिया गया, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग का प्रस्ताव शामिल नहीं किया गया। प्रेस विज्ञप्ति और शासनादेशों में भी उच्च शिक्षा के शिक्षकों को इस लाभ से वंचित रखा गया है। पत्र में प्रोफेसर पाण्डेय ने इसे “निराशाजनक” करार देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद उच्च शिक्षा विभाग द्वारा कैबिनेट में प्रस्ताव नहीं भेजा जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में असाधारण है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम उच्च शिक्षा के शिक्षकों को आंदोलन के लिए बाध्य कर रहा है। उन्होंने मंत्री से आग्रह किया कि संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर कैबिनेट निर्णय में संशोधन किया जाए। तत्काल विशेष कैबिनेट बैठक बुलाकर उच्च शिक्षा के कार्यरत सभी शिक्षकों, शिक्षणेत्तर कर्मचारियों, स्ववित्तपोषित शिक्षकों तथा पेंशनभोगी शिक्षकों-कर्मचारियों को भी कैशलेस चिकित्सा सुविधा का लाभ देने का प्रस्ताव पारित कराया जाए। राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने सरकार से अपील की है कि घोषणा और क्रियान्वयन में भेदभाव न हो, अन्यथा शिक्षक समुदाय में बढ़ते असंतोष को रोकना मुश्किल होगा। यह मुद्दा अब उच्च शिक्षा के शिक्षक संगठनों के बीच गरमागरम चर्चा का विषय बन गया है, और जल्द ही बड़े आंदोलन की आशंका जताई जा रही है।
